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पीपल पूर्णिमा पर लगा कोरोना का ‘ग्रहण’

 

न्यूज नजर। सूर्य चन्द्रमा का ग्रहण तो कुछ घंटों में ही खत्म हो जाता लेकिन कोरोना महामारी रूपी ग्रहण सवा माह गुजर जाने के बाद भी नहीं हट सका। कोरोना का सूतक और ग्रहण काल अभी तक जारी है।

भंवरलाल
ज्योतिषाचार्य एवं संस्थापक,
जोगणिया धाम पुष्कर

सूर्य और चन्द्रमा के ग्रहण भले ही पृथ्वी और चन्द्रमा की छाया का खेल हो मगर धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में इस ग्रहण के सूतक काल से ग्रहण समाप्त होने तक मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं और खाना पीना वर्जित माना जाता है। ग्रहण के बाद स्नान दान पुण्य किए जाते हैं और यह भी कहा जाता है कि इस ग्रहण का प्रभाव आगामी चार पांच महीनों तक पड सकते हैं।

इस कोरोना महामारी में संक्रमण से बचने के लिए लॉकडाऊन लगा दिया गया है। लोग अपने घरों से बाहर नहीं जा सकते ना ही एक साथ एकत्र होने की अनुमति है। आस्था के धर्म स्थल और ठिकाने आम आदमी के लिए बंद हैं। बस पूजा करने वाला व उसकी आस्था की शक्ति देव या ध्यान है।सभी आर्थिक काम बंद है। यातायात व कारोबार। इस ग्रहण का सूतक संक्रमण है और उसके बाद ग्रहण के रूप में कोरोना वायरस का रोग है जो हाथोहाथ अपना फैसला करता जा रहा है। आज भारत ही नहीं वरन् विश्व के सभी देश इस कोरोना महामारी के ग्रहण से घिरे हुए हैं।

 

ऐसे में भारत की भूमि पर वैशाख मास की पूर्णिमा जो पीपल पूनम या बुद्ध पूर्णिमा के नाम से सदा प्रसिद्ध रही है। इस दिन हजारों दान पुण्य विवाह संस्कार तथा जल दान होते हैं। इस दिन बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध के ज्ञान दिवस को विश्व स्तर पर बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। कोरोना महामारी के संकट के लॉकडाऊन में यह सब कुछ अपनी तरह हो नहीं पाएगा और खामोश पीपल के वृक्षपर उदास पूनम की चांदनी पड़ती हुई चली जाएंगी।

पीपल के वृक्ष के साथ धार्मिक आस्था ओर श्रद्धा जुडी रहती हैं और हिन्दुओं के लिए यह वृक्ष बहुत पवित्र होता है। कंवारी कन्याएं अच्छे वर की प्राप्ति के लिए तथा गृहणियां घर में सुख संपत्ति व अच्छी आर्थिक स्थिति के लिए तथा सुखद दाम्पत्य जीवन के लिए गुरुवार के दिन इस पीपल वृक्ष की पूजा अर्चना करती है।

पीपल के वृक्ष को इतना महत्त्व दिया गया है कि वैशाख मास की पूर्णिमा को पीपल पूजन के नाम से जाना जाता है और हजारों शादियां इस दिन हिन्दुस्तान में होती है तथा कई धार्मिक अनुष्ठान व दान पुण्य इस दिन किए जाते हैं।

पूर्णिमा को “पूनम” के नाम से भी जाना जाता है। यह वह तिथि होती हैं जब चन्द्रमा अपनी परिक्रमा करते हुए सूर्य से अधिकतम दूरी पर उस के आमने-सामने हो जाते हैं और सूर्य के प्रकाश से चन्द्रमा जगमगा जाता है और अपनी चांदनी से धरती को प्रकाशित कर देता है।

चन्द्रमा की इसी पूनम की चांदनी जब वैशाख मास में अपनी उच्च की स्थिति मेष राशि ओर उतरायन के सूर्य के प्रकाश में चमकती है तो वह पीपल के वृक्ष के सम्पूर्ण ऊर्जा क्षेत्र को प्रभावी बना देती हैं और यह वैशाख की पूर्णिमा पीपल पूनम के नाम से जानी जाती है। बस इसी के साथ प्रचंड गर्मी शुरु हो जाती हैं।

संत जन कहते हैं कि हे मानव, इस कोरोना महामारी के संकट में कुदरत ने यह तय कर दिया है कि इस जगत में केवल मेरे ही धर्म की प्रधानता है। मानव द्वारा स्थापित किए धर्म गोण है। विश्व स्तर पर किए गए हर शोध विज्ञान विकास मेरे सामने कमजोर है। एक सृष्टि श्रेष्ठ सृष्टि के मेरे पिंड और ब्रह्मांड का एकात्मक स्वरूप तय कर दिया है। मानव द्वारा बनाई गई अभौतिक और भौतिक संस्कृति आस्था आध्यात्मिकता व उसके तंत्र मंत्र टोने टोटके कर्म कांड पूजा अर्चना मोक्ष यह सब प्रकृति अनुमानित नहीं कर रही हैं।

इसलिए हे मानव इस कोरोना महामारी के संकट ने गोतम बुद्ध के सत्य की खोज की तरह ज्ञान का प्रकाश कर दिया है तथा यह तय कर दिया है कि हे मानव तू उलझ मत क्योंकि उलझन संघर्षों को जन्म देती हैं और हर दिन एक नया संकट उत्पन्न होता है। इसलिए इस कोरोना से बच और मन में बसे अहंकार, क्रोध, लोभ, लालच, झूठ, कपट, मिथ्या के कारोबार को त्याग तथा दान और पीपल पूर्णिमा के उजाले में मन को पारदर्शी बना ताकि तूझे असली और नकली का भेद मिल जाएगा और बुद्ध पूर्णिमा तेरे ज्ञान के द्वार खोल जाएंगी।

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