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पेट की आग के सामने ” नौतपा ” व ” कोरोना” बेबस 

न्यूज नजर :  नौ तपा अर्थात नौ दिन तक अपनी पूर्ण की उष्णता के साथ तपाने वाला। सूर्य जब अपनी धुरी पर भ्रमण करता हुआ उत्तरायन की ओर होता है तो वह अपने सोर वर्ष की नयी यात्रा मेष राशि से शुरू कर अपनी उच्चसथ राशि मेष मे आ जाता है और यहां अश्वनी भरणी

भंवरलाल
ज्योतिषाचार्य एवं संस्थापक,
जोगणिया धाम पुष्कर

तथा कृतिका नक्षत्र पर भ्रमण करके जब रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है तो उसकी तीव्र उष्मा पृथ्वी पर पडती है और वह जल स्त्रोतों को सूखा कर भाप बना देतीं हैं और सामानय जीव व जगत को भी भारी मात्रा में तपाने लग जातीं हैं और गर्मी से सभी परेशान होने लग जाते हैं। रोहिणी नक्षत्र आकाश में स्थिर रहने वाला एक विशाल तारा है। आकाश मडंल में यह अपने 13 • २०° के विस्तार तक फैला हुआ है।इसके चार हिस्से जो 3•२०° के विस्तार के होते हैं उन्हे चार चरण कहा जाता है। इस तारे के सामने से सूर्य भ्रमण करता है दो चरण तक इसमे लगभग नौ दिन लग जाते हैं।इन नौ दिनों में इस रोहिणी नक्षत्र के ठंडे क्षेत्र को भी सूर्य गर्म कर देता है और ब्रह्मांड से आने वाले ठंडे रश्मि प्रभाव भी पृथ्वी पर गर्म ऊर्जा को बढ़ा कर जमीन को धरती को तपा देते हैं और धरती के जलस्तर को सूखा कर वाष्प बना कर मानसून का निर्माण करने लग जाते हैं।

              वो ना आंधी थी और ना ही तूफान था। वह तो प्रचंड गर्मी थी जिसकी व्यूह रचना में हवाएं फंस कर निकल रही थी और अपने गुण धर्म को बदल कर आग की तरह चल रही थी। क्या सजीव ओर निर्जीव दोनों पर तीखे घावों का प्रभाव डाल कर “लू^ बनी हुई थी । प्रचंड गर्मी की गर्म हवाओ का यह प्रहार “लू ” कहलाता हुआ उन सब को हर तरह से घायल कर रहा था जो इनके विरोध कर रहे था और बडी अदब से अपनी हिम्मत बनाये हुये था। लू का एक ही झोका जब सब कुछ नष्ट विनष्ट कर देता है तो फिर कई बार चलने वाले लू के दोर पूरे माहौल को अपने कब्जे में लेकर सब कुछ चोपट कर जाते हैं और बर्बादी का मंज़र छोड़ जाते हैं।
    ” लू ” की संस्कृति केवल झुलसाने की होती हैं और इसका जिसने सामना कर लिया वो कितना भी अपने आप को बचाने के प्रयास करता है तो भी वह झुलस जाता है। लू का सामना करने वाले चंद लोग ही होते हैं जो अपने जीवन यापन के लिए इन लू के झोंको के बीच अपना श्रम खुले आसमान के नीचे करते हैं। अगर ऐसा नहीं करते हैं तो पेट की आग उनकों झुलसा देतीं हैं। झुलस कर रह जाता है गरीब का श्रम जो लू से अपने आप को बचाने के प्रयास तो करता है लेकिन धन के अभाव में अपने आप को सुरक्षित नहीं कर पाता है । बस गरीबी और अमीरी की कहानी यही पर समझ में आ जातीं हैं। झुलस कर भी गरीब मुस्करा कर अपने सफर में फिर निकल पडता है किसी भामाशाह की मदद की तलाश में नहीं वरन अपने रोजगार की तलाश में।
               संतजन कहते हैं कि हे मानव वर्तमान में यह नौ तपा की गर्मी और कोराना महामारी का कहर पेट की आग के सामने बेबस से ही हो रहे हैं। गरीब तबके पेट भरने के लिए इधर से उधर भटक रहे हैं। इनके दर्द की आहटे सुनाई आने के बाद भी सुनाई नहीं देतीं। आहटे जब अपने हितों को ठेस पहुचाने वालीं आती हैं तो ही बर्दाश्त के लायक नहीं होती हैं। मानवता के साथ यह भारी कुठाराघात भी सियासत में फंसा रहता है और क़लम भी कुछ लिखने में नौतपा ओर कोराना के कहर से घबराने लग जातीं हैं।
           इसलिए हे मानव तू इस नौ तपा की गर्मी और कोराना महामारी के कहर से बच तथा उन जरूरत मंद लोगो की भी मदद कर जो दर दर भूखे प्यासे ही भटक रहे हैं और कोरोना का कहर एवं नौ तपा भी बेबस हो कर उनके साथ चल रहा है। पशु पक्षी जीव जंतु भी झुलसती गर्मी में जैसे तेसे अपने आप को बचाते हुए श्रम करते हैं और अपना पेट पालते हैं फिर भी गर्म हवाओं के लू के झोंके किसी तरंह का रहम नहीं करते और अपनों हीं प्रकृति की संस्कृति का पालन करते हैं।अन्यथा दया भाव के गुण उन्के अस्तित्व को मिटा कर रख देंगे। इसलिये भारी शोर शराबों के दर्द को महसूस कर और इन्हें भी जमीनी स्तर पर राहत दे।

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