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रोटी और पानी, बस यही सार है 

 

 

न्यूज नजर : रोटी और पानी दुनिया की मूलभूत आवश्यकता है, चाहे वो आदिमानव रहा हो या आधुनिक मानव।सभी रोटी और पानी पर ही जिन्दा रहा है,भले ही यह किसी भी रूप में भक्षण और ग्रहण किए जाते हैं।

भंवरलाल, ज्योतिषी एवं संस्थापक, जोगणिया धाम पुष्कर

 

श्रम बुद्धि ज्ञान बल या विज्ञान और कला अमीरी-गरीबी राजा और प्रजा सब इस रोटी और पानी के लिए ही अपना तमाम जीवन गुजार कर इस दुनिया से चले जाते हैं। चाहे आस्था भगवान में हो या किसी व्यक्ति में लेकिन ये सब भी जमीनी स्तर पर सबको जिन्दा रखने में समर्थ नहीं होते केवल रोटी और पानी ही अपने अलग अलग रूपों में जीव को जिन्दा रखते हैं व इसी के कारण समाजशास्त्र अर्थशास्त्र भूगोल विज्ञान और राजनीति शास्त्र तर्क शास्त्र दर्शननीति आदि सभी को भली भांति सीखने के बाद भी व्यक्ति रोटी और पानी की व्यवस्था में ही मूल रूप से लगा रहता है।

           विकास को ऊंचाईयों पर पहुंचाता श्रम ज्ञान और विज्ञान अंत में रोज रोटी और पानी पर ही जिन्दा रहता है। सभ्यता और संस्कृति में यही रोटी और पानी सामाजिक सम्बंधों का ताना बाना

गूंथ कर विकास करता है और राजनीति शास्त्र इस रोटी और पानी से ही अपनी प्रस्तावना लिख कर उस मंज़िल पर पहुंच जाता है जहां पर रोटी और पानी का वह नियंत्रक बन कर अपने झंडे गाडता है तथा ग्राहक देख कर अपने रंग बदलने लग जाता है। अपने जन्मते ही बच्चा जब रोता है या कोई भी हरकत जिन्दा होते ही नहीं करता है तो माँ का दूध या कृत्रिम ऊर्जा जल पिलाया जाता है और इसी के सहारे उस बच्चे का शनैः शनैः विकास होतां है और मृत्यु तक यही भूमिका रोटी और पानी उसके जीवन में निभाते हैं। जब शरीर इस रोटी और पानी किसी भी ऊर्जा के रूप में ग्रहण करने की क्षमता नहीं रखता है तो व्यक्ति शनैः शनैः इस दुनिया से विदा हो जाता है।

    रोटी और पानी के बिना व्यक्ति जिन्दा नहीं रह सकता है। विकास सुरक्षा की तभी जरूरत होती है जब व्यक्ति जिन्दा है। आज दुनिया में बहुत बड़ा तबका केवल रोटी और पानी के लिए ही दर दर भटक रहा है।भले ही विज्ञान आसमान में रहने की योजना बना रहा है और वहां पर भी रोटी और पानी के कई कृत्रिम तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है, अपने मिशन में आगे बढ रहा है। इस दुनिया में लगभग 30 फीसदी लोग जो रोटी और पानी को अपनें लिए सुरक्षित करके बैठें हैं फिर भीवह रोटी और पानी के लिए खेल की रणनीति बना कर दुनिया को खेल खिला रहे हैं और 70 फीसदी लोग अपनी रोटी और पानी के लिए इस खेल में लगे हुए हैं।

       अपनी स्थिति और परिस्थितियों के अनुसार 70 फीसदी लोग रोटी और पानी के लिए अपने श्रम में लगे रहते हैं और खेल खिलाने वाली उस शक्ति के अलग अलग खेमों में बंट जाते हैं। कोई खेमा रोटी और पानी के लिए अपनी जिस जिस नीति से ओर जिस जिस को भी प्राथमिकता देता है तो उन ही लोगों से रोटी नहीं फिर अपनें नाम का गुणगान करा अपनी शक्ति का भान कराता है और इस खेल में जो शक्ति जितनी प्रवीण है वो कुछ काल के लिए महाबली हो जाती है और अपने अनुयायियों की संख्या बडा कर राजनीति के राजा का मुकुट पहन कर राज करती है।

         संत जन कहते हैं कि हे मानव रोटी और पानी के श्रम से ही मानव समाजशास्त्र अर्थशास्त्र जिन्दा है और उस पर राजनीति शास्त्र अपना राज़ मुकुट पहनता है और रो टी रो टी रो टी ओर पा नी पा नी पा नी की जगह अपनें हीं नाम का सर्वत्र गुण गान करा अपनी हैसियत का भान सबको करवा देता है।

    इसलिए हे मानव रोटी और पानी के लिए तुझे ही अंततः श्रम करना पडेगा भले ही तू किसी भी शक्ति के गुणगान कर। बस फर्क इतना ही रहेगा कि किसी की रोटी और पानी रोज खत्म होगी ओर किसी की कई दिनों तक चलती रहेगी। फिर भी तुझे सदा ही रो टी रो टी रो टी ओर पा नी पा नी पा नी के लिए ही श्रम करना पडेगा चाहे तू दुनिया का अमीर हो या गरीब।

 

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