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आत्मा का प्रबोधन और शयन काल

न्यूज नजर : शरीर में बैठी प्राण वायु रूपी ऊर्जा जिसे आत्मा कहा जाता है वह शयन नहीं करती। शरीर थक कर शयन भी करता है तो भी उसे वह जाग्रत रखती हैं।

भंवरलाल
ज्योतिषाचार्य एवं संस्थापक,
जोगणिया धाम पुष्कर

यही आत्मा जब शरीर से निकल जाती है तो शरीर को सदा के लिए शयन काल में छोड़ उसकी मृत्यु करवा देती हैं। वास्तव में यही आत्मा जमीनी देव है और उसकी आड में मन अपने स्वभाव के अनुसार सांसारिक विषयों का आनंद लेता हुआ हर सत्ताओं का संचालन अपने ही अनुसार कर एक इतिहास छोड़ जाता है।

मन और शरीर अपनी संस्कृति बनाकर दुनिया को सूर्य के उतरायन और दक्षिणायन की तरह देव शयन व देव प्रबोधन काल के अनुसार व्यवहार करता है पर आत्मा रूपी सदा जाग्रत रहने वाले देव की दीपावली रोज़ नहीं मनाता ना ही इस कारण वह प्रकृति के न्याय सिद्धांतों से डरता है। केवल वह शरीर को मन का बादशाह बनाने के विजयी खेल में सदा लगा रहता है। ये क्रम उसे सदा जाग्रत नहीं रहने देते हैं और पूर्ण शयन काल की ओर ले जाते हैं। उसकी आत्मा का फिर देव प्रबोधन नहीं होता।

हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी से कार्तिक मास की शुक्ल एकादशी तक का समय देवशयन काल माना जाता है। अर्थात ऐसी मान्यता है कि सारे देवता सो जाते हैं तथा हर तरह के मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है। कार्तिक मास की शुक्ल एकादशी को विष्णु जी निद्रा से जाग जाते हैं तथा सभी मांगलिक कार्य पुनः प्रारंभ हो जाते हैं।

आदि ऋषियों ने इस पूरे चतुर्थ मास में एक स्थान पर बैठकर जप तप के निर्देश दिए तथा वर्षाकाल मे होने वालीं बीमारियों से बचने के लिए तथा वर्षा से सभी अव्यवस्था फ़ैल जाने के कारण इन चार माह में सभी मांगलिक कार्य रोक दिए जाने के निर्देश दिए। यह वर्षा ऋतु का चतुर्थ मास देव शयन काल कहलाया। वास्तव में ये ही जमीनी हकीकत है।

प्रकृति ने अपना प्रबन्धन सुव्यवस्थित करते हुए जीव व जगत को मौसम के अनुसार ही व्यवहार करने के लिए प्रेरित किया है। सूर्य के दैनिक चालन से दिन रात बनाई वहीं सूर्य की वार्षिक गति से ऋतु निर्माण कर उसी अनुसार कार्य करने के संदेश दिए। वर्षा ऋतु के साथ चार महिनों में अपने विशेष प्रबन्धन में प्रकृति ने आन्तरिक ऊर्जाओं को बढा, सृजन करने के सूत्र को बता सर्वत्र वर्षा करा गर्मी की ऋतु से तपती धरती को जल से परिपूर्ण कर पृथ्वी को उपजाऊ बना वनस्पतियों तथा खाद्यान्नों को उतपन्न किया।

वर्षा ऋतु के काल में यातायात खानपान उद्योग धंधे सभी प्रभावित होते हैं इस कारण इन चार माह में सभी कार्य मे अवरोध पैदा होने से सभी मांगलिक कार्य रोक दिए जाते है तथा उसके बाद सभी कार्यो को सुचारु रूप से किया जा सकता है। अतः प्रकृति ने सभी कार्यो के लिए वर्षा काल का अवरोध खत्म कर दिया। यही शुभ कार्यो के जागरण का काल है। देव अर्थात शुभ करने वाली शक्ति देव ऊठनी एकादशी है और शुभ कार्यो के प्रारंभ का काल है।

संत जन कहते हैं कि हे मानव, प्रकृति का हर काल जाग्रत रहता है और हर काल में उसकी क्रिया अपना काम करती है। प्रकृति स्वयं शक्ति है और उसके सो जाने से प्रलय के अतिरिक्त और कुछ भी नही होगा। ये सदैव जाग्रत रह कर अपना कार्य करती रहती है। चाहे कोई सा भी ऋतु काल क्यो ना हो।

इसलिए हे मानव, शरीर में बैठी आत्मा जो प्राण वायु रूपी ऊर्जा कहलाती हैं उसकी ओर देख जो सदा शरीर को जाग्रत ही रखती है और सदा प्राण रूपी दीपक जला शरीर को रोज दीवाली मनवाती है ओर स्वयं सदा जाग्रत रह कर मानव को जिन्दा रखती है अन्यथा उसका शयन काल मृत्यु बन कर व्यक्ति का अस्तित्व खत्म कर देता है। इसलिए तू भले ही शरीर आराम के लिए शयन कर लेकिन ऋतुओं के गुण धर्मों का पालन कर ओर आत्मा रूपी देव को जगाए रख।

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