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 काल किस ओर ले जा रहा है..?

 

 

  न्यूज नजर :  काल चक्र अपने रथ पर सवार हो कर वर्तमान को भूत बनाये जा रहा था और भविष्य को वर्तमान बनाने के लिए आगे की ओर सभ्यता संस्कृति को ले जा रहा था। क्या सत्य है क्या उचित है और क्या लाभ है या क्या हानि इन मानवीय दृष्टिकोणों से उसे कोई सरोकार नहीं होता है।

ज्योतिषाचार्य भंवरलाल, संस्थापक जोगणिया धाम पुष्कर

आत्मा की आवाज और मन के निर्णय यह सब ज्ञान के मानव की अपनी बनायी हुई परिभाषाएं हैं । व्यक्ति परिवार समाज देश तथा सभ्यता और संस्कृति को ज्ञान ही उपजा रहा था फिर भी कर्म की भूमि कहीं पर उपजाऊ तो कहीं पर बंजर बनती जा रही थी। कर्म की भूमि से निकला फल रूपी अमृत कलश का बंटवारा भी ज्ञान ही कर रहा है । लोभ

रूपी मोहिनी ने ज्ञान को अपने आँचल से ढक दिया। आत्मा और मन की आवाज़े विरोध रूपी राहू बन अमृत कलश को छीनने लगी।

          लोभ के आँचल से ढका ज्ञान आत्मा की आवाजें दबाता रहा। मन को बुलंद करने के लिए वह नूतन नई परिभाषाओ को जन्म देता रहा और व्यक्ति परिवार समाज तथा सभ्यता संस्कृति की कर्म भूमि को किस्मों में बांटता हुआ पूरे समग्र में से उन को चुनता रहा जो उसकी लाठी की जय जय कार करते रहे। भक्ति यह सब कुछ देख कर विभाजन की और बढ़ गयीं और कोई पत्थरों में खो कर बेसुध था तो कोई मानव की शरण में जा कर किसी के उपदेश सुनने लग रहा था। यह सब कुछ मानव ही कर रहा था और कोई किसी एक को ही उसका जिम्मेदार ठहराने में लग रहा था।

         मानव इसी गलतफहमी में रहता है कि इस काल को अपने सांचे में ढाल कर इसे अपना ही जामा पहना दूंगा। काल की कोई आकृति नहीं होती और ना ही कोई उसे अपने सांचो में ढाल पाया और केवल मन मन उछलकूद करता रहा तथा कभी किसी को और कभी किसी को हर घटनाक्रम का जिम्मेदार ठहराता रहा। 

        मानव समूह और संगठन अपने उद्देश्य की संस्कृति को स्थापित करने के लिए आगे बढ रहा था तो और काल की नाव को अपने अनुसार ही खेने में लग रहा था और प्राकृतिक न्याय सिद्धांतो की अवहेलना कर रहा था। प्रकृति के न्याय सिद्धांत और मानव के अपने नियम क़ायदे आपस में टकरा रहे थे, काल मूक गवाह बन इन सब को इतिहास में बदलता जा रहा था।  सभ्यता और संस्कृति की बनी नयी परिभाषाओ को आगे ले जा रहा था।

           संतजन कहते हैं कि हे मानव जब कोई व्यक्ति समूह संगठन सार्वभौमिक सिद्धांत को नकार केवल अपने ही सिद्धांतों को बलिष्ठ मान संस्कृति की नवीन परिभाषाओं को जन्म देता है तो फिर संस्कृति संघर्ष करती हुईं व्यवस्था का तालमेल बिगाड़ अहिंसा से हिंसा की ओर बढने लग जाती है। व्यक्ति समूह और संगठन नहीं काल ही उस संघर्ष की संस्कृति को आगे ले जाता है और मेला ज्ञान कुछ एक को ही इसका भारी जिम्मेदार बनाने में तुल जाता है।

         इसलिए हे मानव प्राकृतिक न्याय सिद्धांतों की अवहेलना मत कर। इसके खिलाफ बनायी गई संस्कृति ही संघर्ष और हिंसा का कारण बनती हैं, मानव अनावश्यक ही एक दूसरे पर भारी दोषारोपण करने लग जाता है और इसी संस्कृति को काल आगे ले जाता है।

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