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जल कर राख हुई उस होली के ये बयां थे 

न्यूज नजर : हे जगत सराय के मुसाफिर तूने अपनी जीत के लिये मुझे जला डाला ओर राख़ बना डाला । मै जलती रही और तू आनंद मना रहा था, चंग की थाप पर उमंगो के वीर रस के डंडे बजा रहा था। मन के आंगन में फैली गंदगी को तू साफ नहीं कर पा रहा था और घर में गंगाजल डलवा रहा था।
भंवरलाल
ज्योतिषाचार्य एवं संस्थापक,
जोगणिया धाम पुष्कर

जला कर राख करनी थी तुझे नफरत और धृणा की दीवारे ओर उसमे बैठी तमाम बुराइयां जो वैमनस्यता फैला रही थी और दिलो के बटवारे कर रही थी। लेकिन तूने गज़ब कर डाला और इन सब को छोड़ मुझे ही जला डाला। मै तो घास फूस और लकड़ियों का केवल ढेर थी और तू इसे बुराई का प्रतीक मानता रहा ओर मुझे जलाता रहा पर अपने मन के आँगन की बुराइयों को बचाता रहा और हर बार मुझे ही जला जला कर खुशियों के रंग लगाता रहा।

         मै ना देव की ओर ना ही किसी दानव की कथा सुना रही हूं मैं सिर्फ मन की मनोवृत्ति रखने वाले मानव की हकीकत बता रही हूं जो समझ कर भी नहीं समझना चाहता है और हर मुझे जला जला कर समझा रहा है कि हे होली तू बुराई का प्रतीक है इसलिए मैं तुझे जला रहा हू और तेरी राख बन कर रंग गुलाल की खुशियां मना रहा हूं।मेरे जलने के उत्सव मनाने के बहाने तू अपने मन की भड़ास निकाल रहा है और किसी को गधा और किसी को शेर बना रहा है।
      तू सदियों से मुझे ही जलाता आ रहा है, मन की बुराइयों का विस्तार किये जा रहा है। ना तो मैं जल जल कर थकी हूं और ना ही नयी नयी बुराईयों को पैदा करके तू कमजोर बना है। तेरे और मेरे खेल में तू समझ नहीं पा रहा है कि आखिर कौन जल रहा है। मै तो जल कर राख हो जातीं हू और हवा में उड़ कर फिर जहां में छा जाती हूं। तू मझे जला कर भी अपनी बुराईयों को जला नहीं पाता है और नईं बुराईयों जखीरा हर बार लेकर आ जाता है और खुद ही जल जल कर मेरे बहाने अपने दाग धोने लग जाता है।
       तेरी सारी बुराईयों का अंत कोई भी बलवान नहीं कर पायेगा लेकिन इस खेल में एक दिन तू मेरी गोद में होगा तब मै भी बुराईयों का अंत नहीं केवल तेरा ही अंत कर दूंगी। बस इस खेल की यह सच्चाई है कि तू बार बार मुझे जला कर मेरे अस्तित्व का अंत नहीं कर पायेगा ओर मै एक बार ही इस दुनिया से तेरे वजूद का अंत कर दूंगी।
      संत जन कहते हैं कि हे मानव जब तक दिल ओर दिमाग में ईर्ष्या जलन घृणा नफ़रत बंटवारा करने की नीति झूठ कपट मिथ्या ओर दूसरों को हीन भावना से देखने की बुराइयों की आग जलती रहेगी तो हर रंग अपनी खूबसूरती को खो देगा। फिर होलियां जल कर राख होतीं रहेगी और स्वार्थ के रंग ही एक दूसरे पर लगाये जायेगे और रंगों की दुनिया अपने गुण धर्म से मोहताज हो जायेंगी।
    इसलिए हे मानव तू भले ही बुराईयों के प्रतीक की होली जला और प्रेम भाईचारे, विभिन्नता में एकता के रंगों का आनंद ले लेकिन अपने मन से बुराईयों का जखीरा बाहर निकाल ताकि होली तो आये लेकिन नये जख्मो का जखीरा वो अपने साथ ना लाये।

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