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नव विक्रम संवत और ज्योतिष शास्त्र की मान्यताएं

न्यूज नजर। भारतीय ज्योतिष शास्त्र की मान्यताओं के अनुसार हर वर्ष हिन्दू मास चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नव विक्रम संवत का प्रारंभ माना जाता है जो अगले वर्ष की चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक रहता है।

भंवरलाल, ज्योतिषाचार्य एवं संस्थापक, जोगणिया धाम पुष्कर

चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन हिन्दु राजा विक्रमादित्य ने आक्रमण कारी शको पर 57 ईसा पूर्व विजय के उपलक्ष में एक संवत प्रारंभ किया और इसका नाम विक्रम संवत रखा। 6 अप्रेल 2019 को चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नव विक्रम संवत 2076 प्रारंभ हो गया।

हिन्दू और ज्योतिष शास्त्र की मान्यताओं में हिन्दू नववर्ष माना जाता है और घर की लिपाई पुताई की जाती है। घर पर नई ध्वजा लगाकर नववर्ष का आगाज़ किया जाता है। नए वस्त्र धारण किए जाते हैं तथा घर में मिष्ठान बनाए जाते हैं तथा एक साथ बैठकर भोजन किया जाता है।

सन्धया के समय जलाशय, मंदिर तथा घर के बाहर दीपदान किए जाने की परंपरा रही है।धार्मिक मान्यताओं में इस दिन से शक्ति की उपासना में नवरात्रा शुरू होते हैं और नौ दिन शक्ति के निमित्त पूजा-अर्चना उपासना अनुष्ठान किए जाते हैं।

भारतीय ज्योतिष शास्त्र भी आकाशीय ग्रह नक्षत्रों और धार्मिक मान्यताओं से जुडा हुआ है अतः नए संवत के शुरू होने पर आकाशीय ग्रहों की स्थिति का एक मानचित्र बनाते हैं जिसे कुंडली कहते हैं। इस कुंडली में जो ग्रह बैठे हैं उनकी गति, राशि परिवर्तन और वार के आधार पर दस पद व उसके पदाधिकारी तय किए जाते हैं जो अपने पद व स्थिति तथा गति के अनुरूप वर्ष भर किस तरह के प्रभाव दे सकते हैं उसका एक लेखा जोखा तैयार करते हैं।

पूर्व काल में राजा और आम जन भी इस ज्योतिष शास्त्र के लेखे जोखे की सूचना को सुनकर अपने वर्ष भर की काम करने की योजना बनाकर अच्छे समय का लाभ व बुरे समय को टालते रहते थे।

चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा के दिन जो वार होता है उसी वार के ग्रह के अधिपति को राजा माना जाता है। सूर्य की मेष संक्रांति के दिन जो वार होता है उसे मंत्री माना जाता है तथा अन्य संक्रांति व वार के आधार पर वित्त रक्षा कृषि के रबी और खरीफ तथा वर्षा रस व निरस व फल के विभाग व उनके पदाधिकारी तय किए जाते हैं।

विक्रम संवत 2076 में वर्ष का राजा शनि ग्रह तथा मंत्री सूर्य होगा। सस्येश – मंगल। नीरसेश – मंगल। धनेश – मंगल। धान्येश – चन्द्र। मेघेश – शनि। फलेश – शनि। दुर्गेश – शनि। रसेश – गुरु। यह ग्रह और उनकी स्थिति गति और उनके प्रभाव तथा अन्य ग्रहों के साथ उनके योग आदि की स्थित के प्रभाव देखकर वर्ष भर में हर क्षेत्र में क्या स्थिति रहेगी उसका एक आकलन किया जाता है और ग्रहों के संकेत जन साधारण को बताए जाते हैं।

संत जन कहते हैं कि हे मानव, मान्यताएं, विश्वास, आस्था, धर्म सभी सदियो से चली आ रही संस्कृति है और अदृश्य शक्ति के अदृश्य देव पर आधारित हैं। विज्ञान भले ही कितनी भी उन्नति कर ले पर आस्था और श्रद्धा का मानव कभी भी अपनी संस्कृति को नहीं छोड़ सकता। इसलिए धर्म ओर विज्ञान दोनों ही सभ्यता ओर संस्कृति में साथ साथ चलते हैं। आस्था ओर श्रद्धा का मानव अंधविश्वासों में भले ही विश्वास ना करे फिर भी वो विश्वास रूपी परमात्मा के ही अंतिम सत्य को ही स्वीकार कर आस्था और श्रद्धावान बना रहता है।

इसलिए हे मानव, ये ऋतुओ का बदलता चक्र स्वयं अपना प्रमाण देता है कि ये बसंत ऋतु है और आकाश का साक्षात तारा सूर्य अपनी धुरी पर यात्रा का एक चक्र पूरा करते हुए पुनः यात्रा के प्रारंभिक बिन्दु पर आकर नए सौर वर्ष का आगाज़ कर रहा है। अतः नई व्यवस्था ओर नए प्रबन्धन की ओर बढने के लिए शक्ति के संचय की योजना बना।

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