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पूर्णिमाओं में जो ‘गुरु’ हो…

न्यूज नजर : प्रकृति अपनी पूर्णता और प्रलय दोनों रूपों को आकाश में स्थित चन्द्रमा के रूप में प्रस्तुत करती हैं। सृष्टि सृजन के रूप में प्रकृति चन्द्रमा को पहली कला के रूप में दिखाती है जो किसी को नजर नहीं आता है और दूसरी कला के रूप में नये चन्द्रमा का अस्तित्व नजर आता है और पन्द्रहवें चन्द्रमा के रूप में उसे पूर्ण प्रकाशित कर पूर्णता का परिचय कराती है। इसी चन्द्रमा की पूर्णता को हम पूर्णिमा के नाम से जानते हैं।

भंवरलाल, ज्योतिषाचार्य एवं संस्थापक, जोगणिया धाम पुष्कर

सोलहवे दिन प्रकृति चन्द्रमा की पूर्णता का एक अंश घटाना शुरू कर देती है और तीसवे दिन चन्द्रमा आकाश में नजर नहीं आता है और यही प्रलय काल बन कर फिर नयी सृष्टि की संरचना को जन्म देता है।

 

      वर्ष भर में हर मास प्रकृति चन्द्रमा को बारह बार यह पूर्णता का खेल दिखा कर बारह पूर्णिमा का निर्माण करती हैं। हर मास की पूर्णिमा के गुण धर्म के आधार पर मानव ने इस पूर्णिमा का महत्व बताया है और इन बारह पूर्णिमा में से आषाढ़ मास की पूर्णिमा को ” गुरु” अर्थात बड़ा बताया है।

साधारण शब्दों में गुरु उसे ही कहा जाता है।  ” गुरु” अर्थात जिसमें सृजन पालन और संहार करने की शक्ति हो तथा वह जीवन के हर मार्ग पर आगे बढने की प्रेरणा देता है तथा ज्ञान कर्म ओर भक्ति का संदेश देकर प्रकृति और जगत से सामंजस्य स्थापित करने का कार्य करता है और करवाता है। 

 

      आषाढ़ मास में “नौ” तपा सूरज जब अपनी गर्मी से सब कुछ मिटाने के लिए जीव व जगत को अत्यधिक तपाने लग जाता है और सभी गर्मी से त्राहि त्राहि करने लग जाते हैं पृथ्वी पर जल संकट बढ जाता है तब आषाढ़ मास सूर्य को उतरायन से वापस दक्षिणायन की ओर ले जाने का प्रयास करता है और पूर्णिमा तक सूर्य को दक्षिणायन की ओर गति कर वर्षाऋतु का आगाज़ कर देता है।

धरती को जल से परिपूर्ण कर सृष्टि जगत में नये उत्पादन की बुनियाद रख देता है और उसी से वर्ष भर संसार के जीव व जगत का पालन पोषण होता है और अत्यधिक वर्षा प्रलय बन कर अपना विकराल रूप दिखाती है। इन सब स्थितियों को देख कर मानव को स्वत ही ज्ञान कर्म ओर भक्ति का संदेश इस आषाढी पूर्णिमा से मिल जाता है। धरती पर नये सृष्टि उत्पादों की बुनियाद यही आषाढी पूर्णिमा रखती हैं, इस कारण यह गुरु पूर्णिमा कहलाती हैं जो सभी पूर्णिमा से यह श्रेष्ठ बन जाती है।

            संतजन कहते हैं कि हे मानव प्रकृति की स्थिति को देख धर्म ने इसकी महत्ता को स्वीकार कर। इसे धार्मिक और आध्यात्मिक रूप दिया ओर प्रकृति और जगत के बारे में चिंतन कर उस ज्ञान का बखान करने वाले को ” गुरु ” कहा। इसके बाद यह गुरु पूर्णिमा इस धरती पर हर तरह के ज्ञान के गुरुओं को स्थापित करती रही और उन गुरुओं को जमीन का भगवान ही नहीं उससे भी बढ कर स्थापित करने लग गयी। कारण भगवान तो अदृश्य विश्वास है लेकिन गुरु जगत का जीता जागता विश्वास है।

       इसलिए हे मानव यह प्रकृति ही सर्वोपरि है जो आषाढ मास की पूर्णिमा को गुरु रूप में ला कर सृष्टि जगत के नये सृष्टि उत्पादों की बुनियाद रखती हैं और जीव जगत का पालन पोषण करती हैं। सभी को जल रूपी जीवन प्रदान करती हैं और अपने इस कार्य को धरती के अखाडे पर कर अपने ज्ञान कर्म और भक्ति का संदेश देती है। इसके लिए कोई गुरु दक्षिणा भेंट नहीं लेती, स्वयं ही अपने ज्ञान का प्रचार प्रसार कर देती है तथा जमीनी स्तर पर सभी का कल्याण कर देती है।

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