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मंदिर दर्शन : माँ बगलामुखी को प्रिय है पीत वर्ण, जानिए क्या है वजह

नलखेड़ा। द्वापर युग से चला आ रहा यह मंदिर अत्यंत चमत्कारिक भी है। इस मन्दिर में विभिन्न राज्यों से तथा स्थानीय लोग भी एवं शैव और शाक्त मार्गी साधु-संत तांत्रिक अनुष्ठान के लिए आते रहते हैं।
यहाँ बगलामुखी के अतिरिक्त माता लक्ष्मी, कृष्ण, हनुमान, भैरव तथा सरस्वती की मूर्तियां भी स्थापित हैं। कहते हैं कि इस मंदिर की स्थापना महाभारत में विजय के उद्देश्य से भगवान कृष्ण की सलाह पर युधिष्ठिर ने की थी। मान्यता यह भी है कि यहाँ की बगलामुखी प्रतिमा स्वयंभू है। प्राचीन तंत्र ग्रंथों में दस महाविद्याओं का उल्लेख है जिनमें से एक है बगलामुखी।
तंत्र मार्ग में माँ भगवती बगलामुखी का महत्व समस्त देवियों में सबसे विशिष्ट है। विश्व में इनके सिर्फ तीन ही महत्वपूर्ण प्राचीन मंदिर हैं, जिन्हें सिद्धपीठ कहा जाता है। यह मन्दिर उन्हीं से एक बताया जाता है।
प्राचीन तंत्र ग्रंथों में दस महाविद्याओं का उल्लेख मिलता है। उनमें से एक है बगलामुखी। मां भगवती बगलामुखी का महत्त्व समस्त देवियों में सबसे विशिष्ट है। भारत में मां बगलामुखी के तीन ही प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर माने गए हैं जो क्रमशः नलखेड़ा (मध्यप्रदेश) तथा कांगड़ा (हिमाचल) एवम दतिया (मध्यप्रदेश) में स्थित हैं।
जिन्हें सिद्धपीठ कहा जाता है। तीन मुखों वाली त्रिशक्ति माता बगलामुखी का यह मंदिर जिला मध्यप्रदेश के 51वें जिले आगर मालवा की तहसील मुख्यालय (क़स्बे ) नलखेड़ा में लखुंदर नदी के किनारे स्थित है।
पंडित दयानंद शास्त्री
वास्तु एंड एस्ट्रो एडवाइजर, उज्जैन

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि ऐसी मान्यता है कि मध्य में मां बगलामुखी और दाएं मां लक्ष्मी और बाएं मां सरस्वती हैं। त्रिशक्ति मां का मंदिर भारत में और कहीं नहीं है। द्वापर युगीन यह मंदिर अत्यंत चमत्कारिक है। यहां देश भर से शैव और शाक्त मार्गी साधु-संत तांत्रिक अनुष्ठान के लिए आते रहते हैं।

मां भगवती बगलामुखी का यह मंदिर बीच श्मशान में बना हुआ है। देश के कई बड़े दिग्गज नेता अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए और संकट से रक्षा के लिए पूजा-पाठ और अनुष्ठान कराने आते हैं। आमजन भी अपनी मनोकामना पूरी करने या किसी भी क्षेत्र में विजय प्राप्त करने के लिए यज्ञ-हवन और पूजा-पाठ करवाते हैं।
इस मंदिर परिसर में माता बगलामुखी के अतिरिक्त माता लक्ष्मी, कृष्ण, हनुमान, भैरव तथा सरस्वती भी विराजमान हैं। इस मंदिर की स्थापना महाभारत में विजय पाने के लिए भगवान् कृष्ण के निर्देश पर महाराजा युधिष्ठिर ने की थी। मान्यता यह भी है कि यहां की बगलामुखी प्रतिमा स्वयंभू है। इस मंदिर में बिल्व पत्र, चंपा, सफेद आंकड़ा, आंवला, नीम एवं पीपल के वृक्ष एक साथ स्थित हैं। मंदिर श्मशान क्षेत्र में होने के कारण यहां सामान्य दिनों में लोगों का आना-जाना कम ही होता है, लेकिन नवरात्रि में यहां पर भक्तों की बहुत भीड़ रहती हैं।
नलखेड़ा (मध्यप्रदेश) स्थित मां बगलामुखी मंदिर की प्रसिद्धि में वास्तुनुकूल भौगोलिक स्थिति की महत्त्वपूर्ण भूमिका है जो इस प्रकार है –
मंदिर परिसर के बाहर पूर्व दिशा में काफी दूर तक ढ़लान है और ढ़लान के बाद पूर्व दिशा में ही एक नहर पश्चिम दिशा स्थित नदी से निकलकर दक्षिण दिशा होती हुई ईशान कोण की ओर जा रही है। इस प्रकार मंदिर परिसर के बाहर पूर्व दिशा नीची हो रही है। मंदिर परिसर के बाहर पार्किंग के बाद ईशान कोण में तीखा ढ़लान और बड़ा गड्ढ़ा है। वास्तुशास्त्र के अनुसार पूर्व दिशा की नीचाई शक्ति और सफलता प्राप्त करने में सहायक होती है।
मंदिर परिसर के अंदर ही पश्चिम दिशा में 7-8 फीट नीचे एक शेड़ बना है जिसके अन्दर कई यज्ञ कुण्ड बने हुए है जहां यज्ञ किए जाते हैं। इस शेड़ के बाद पश्चिम दिशा में ही मंदिर परिसर के बाहर पश्चिम दिशा में ही लखुन्दर नदी बह रही है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि वास्तुशास्त्र के अनुसार पश्चिम दिशा की यह नीचाई यहां आने वाले भक्तों में गहरी धार्मिक आस्था उत्पन्न करने में सहायक होती है। ठीक वैसे ही जैसे उज्जैन शहर की पश्चिम दिशा में भी शिप्रा नदी बह रही है इसी कारण उज्जैन शहर धार्मिक नगरी के रूप में प्रसिद्ध है।
बगलामुखी माता, नलखेड़ा के इस प्राचीन मंदिर में नवरात्र में माँ के भक्तों की  भीड़ का जमावड़ा  होता हैं।
मन्दिर में 16 खंभों का 250 साल पुराना हैं सभामंडप
मंदिर परिसर में 16 खंभों वाला सभामंडप है, जो 252 साल पहले संवत 1816 में पंडित ईबुजी दक्षिणी कारीगर श्री तुलाराम ने बनवाया था।
इसी सभा मंडप मे मां की और मुख करता एक कछुआ है, जो यह सिद्ध करता है कि पुराने समय में मां को बलि चढ़ाई जाती थी। मंदिर के ठीक सम्मुख लगभग 80 फीट ऊंची दीपमालिका है। कहा जाता है कि इसका निर्माण महाराजा विक्रमादित्य ने करवाया था।
इस मंदिर प्रांगण मे ही एक दक्षिणमुखी हनुमान का मंदिर, एक उत्तरमुखी गोपाल मंदिर तथा पूर्वमुखी भैरवजी का मंदिर भी है। मुख्य द्वार सिंहमुखी भी अपने आप में अद्वितीय है।
ऐसा है मां बगलामुखी का स्वरूप–
पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि मां बगलामुखी में इस मन्दिर में भगवान अर्धनारीश्वर महाशंभों के अलौलिक रूप का दर्शन मिलता है। भाल पर तीसरा नेत्र व मणिजडि़त मुकुट व चंद्र इस बात की पुष्टि करते हैं। बगलामुखी को महारुद्र (मृत्युंजय शिव) की मूल शक्ति के रूप में माना जाता है। वैदिक शब्द बग्ला है उसका विकृत आगमोक्ता शब्द बगला अत मां बगलामुखी कहा जाता है।
चूंकि भगवती बगला अष्टमी विद्या है। आराधना श्री काली, तारा तथा षोडशी का ही पूर्व क्रम है। सिद्ध-विद्या-त्रयी में पहला स्थान है।
मां बगलामुखी को रौद्र रूपिणी, स्तभिंनी, भ्रामरी, क्षोभिनी, मोहनी, संहारनी, द्राविनी, जिम्भिनी, पीतांबरा, देवी त्रिनेभी, विष्णुवनिता, विष्णु-शंकर भमिनी, रुद्रमूर्ति, रौद्राणी, नक्षत्ररूपा, नागेश्वरी, सौभाग्य-दायनी, सुत्र संहार, कारिणी सिद्ध रूपिणी, महारावन-हारिणी परमेश्वरी, परतंत्र, विनाशनी, पीत-वासना, पीत-पुष्प-प्रिया, पीतहारा, पीत-स्वरूपिणी, ब्रह्मरूपा कहा जाता है।
जानिए क्यों चढ़ाते हैं पीली सामग्री माँ बगलामुखी को
मां की उत्पत्ति के विषय में प्राण तोषिनी में शंकरजी पार्वती को इस प्रकार बताया है-एक बार सतयुग में विश्व को विनिष्ट करने वाला तूफान आया। इसे देखकर जगत की रक्षा में परायण श्री विष्णु को चिंता हुई। तब उन्होंने सौराष्ट्र देश में हरिद्रा सरोवर के निकट पहुंचकर तपस्या शुरू की। उस समय मंगलवार चतुर्दशी को अद्र्ध रात्रि के समय माता बगला का अविर्भाव हुआ। त्रैलोक्य स्तभिनी महाविधा भगवती बगला ने प्रसन्न होकर श्रीविष्णु को इच्छित वर दिया, जिसके कारण विश्व विनाश से बच गया। भगवती बगला को वैष्णव तेजयुक्त ब्रह्मामास्त्र-विद्या एवं त्रिशक्ति भी कहा गया है। ये वीर रात्रि है। कालिका पुराण में लिखा है की सभी दसमहाविधाएं सिद्ध विघा एवं प्रसिद्ध विद्या है इनकी सिद्धि के लिए न तो नक्षत्र का विचार होता है और न ही कलादिक शुद्धि करनी पड़ती है। ना ही मंत्रादि शोधन की जरूतर है। महादेवी बगलामुखी को पीत-रंग (पीला) अत्यंत प्रिय है। यही कारण है की मां को ये पीली वस्तुएं चढ़ाई जाती है।
कैसे पहुँचें नलखेड़ा
वायु मार्ग:— नलखेड़ा के बगलामुखी मंदिर स्थल के सबसे निकटतम इंदौर का एयरपोर्ट है।
रेल मार्ग:— ट्रेन द्वारा इंदौर से 30 किमी पर स्थित देवास या लगभग 60 किमी मक्सी पहुँचकर भी शाजापुर जिले के गाँव नलखेड़ा पहुँच सकते हैं।
सड़क मार्ग:– इंदौर से लगभग 165 किमी की दूरी पर स्थित नलखेड़ा पहुँचने के लिए देवास या उज्जैन के रास्ते से जाने के लिए बस और टैक्सी उपलब्ध हैं।

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