Breaking News
Home / breaking / मकर संक्रांति : काल के सामने तो सूर्यदेव भी बेबस

मकर संक्रांति : काल के सामने तो सूर्यदेव भी बेबस

 

न्यूज नजर : काल का बल इतना शक्तिशाली होता है कि वह मजबूत व्यक्ति को मजबूर बना देता है और मजबूर व्यक्ति को मजबूत बना सारी स्थिति को उलट देता है।

भंवरलाल
ज्योतिषाचार्य एवं संस्थापक,
जोगणिया धाम पुष्कर

ये काल की ही प्रधानता है कि सूर्य जो प्रचंड आग का गोला और अग्नि तत्व प्रधान है वह अपनी तेज गर्म किरणों से सभी को तपा देता है लेकिन कडाके की ठण्ड व शिशिर ऋतु सूरज की परवाह किए बिना अपना परचम लहरा देती हैं और सूरज की तेजी में भी ठंडी हवाएं कंपकपी बढा देती हैं। वराहमिहिर कहते हैं कि काल की प्रधानता के कारण ही रात के समय उल्लू कौए को मार देता है और वही दिन के समय कव्वा उललू को मार देता है।

उत्तरायन की ओर बढता सूर्य अपनी किरणों के भारी और गर्म प्रभाव भले ही उत्तर दिशा में डाल रहा है लेकिन बदले में वहां बर्फबारी, बर्फीली हवाओं में तेजी से कडाके की ठण्ड शुरू हो गई है और जनमानस को कंपकपी छुड़वा रही है, सूरज की तेज गर्म किरणें मजबूर बनकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है।

पानी के तालाब और जलाशय अब नौका बिहार के स्थान ना रहकर खेल और बर्फ के मैदान बन चुके हैं। यह काल की ही प्रधानता है कि एक ही ऋतु ने मजबूत बने सूरज को भी प्रभावहीन और मजबूर बना दिया।

ये तो प्रकृति का ऋतु चक्र ही है जो सूरज की उष्णता को बसंत बना उसे राजा बना देती है और गर्मी बनकर वही राजा सबको एक बार में ही झुलसा देता है। वहीं बरसात बन वह ऋतु सूरज के रास्तों को साफ़ कर देती है तो वही ठंड की ऋतु उसे ठंडा कर मजबूत से मजबूर बना देती है। ये सब सूरज के नहीं मौसम के मिजाज हैं। हम पृथ्वीवासी हैं और पृथ्वी की वार्षिक गति ही इस सूरज के रंग रूप को सदा बदलती रहती है।

आकाश मंडल में स्थित मकर और कुंभ राशि शिशिर ऋतु को धारण किए होती हैं और यहां से सूरज की गर्मी ठंड खा जाती हैं और एक कंपकपी सी छूट जाती हैं। सूरज अपने स्थान पर स्थित रहता और अपनी ही धुरी पर भ्रमण करता हुआ सूरज ना तो उदय होता है और ना ही अस्त, ये तो पृथ्वी की दैनिक गति है जो दिन-रात बनाती है और सूरज को उदय और अस्त होता हुआ दिखाती है और अपना सदा बहार क्रम जारी रखती है।

संतजन कहते है कि हे मानव, अदृश्य शक्ति के अदृश्य देव की यह सब रचना मानते हुए धार्मिक मान्यताएं समाज को एकजुट रखने के लिए उत्सवों का आयोजन कर सभी को सहयोग, समन्वय, प्रेम और भाईचारे से रहने के लिए प्रेरित करती हैं। यही प्रेरणा एकजुट होकर मजबूत बनने की ओर अग्रसर करती हैं कि हे मानव, तू मजबूरी को छोड़ ओर मैं से हम के चोले धारण कर।

इसलिए हे मानव, इस जगत में कोई भी ना तो मजबूत होता है और ना ही कोई मजबूर। केवल काल बल की प्रधानता ही मजबूत को कमजोर बना देती है और मजबूर को मजबूत बना देती है। इसलिए हे मानव तू काल की बेला के अनुसार ही अपना कार्य कर। यही मकर संक्रांति आने वाले कल को फिर बंसत की ओर ले जाएगी और सभी को सुखी समृद्ध बना देंगी।

Check Also

 ट्रेनों में मसाज सुविधा का प्रस्ताव कैंसिल, भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताया

नई दिल्ली। पश्चिम रेलवे ने इंदौर से चलने वाली 39 ट्रेनों में यात्रियों के लिए …