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मन को लुभाती हुईं बरसे बदलियां सावन की 

न्यूज नजर : मन को लुभाती हुईं सावन मास की बदलिया रिमझिम रिमझिम बरस रही है और इस धरती को ही नहीं सभी जीवों को आनंद की अनुभूति करा रही है। काली घटायें और कडकती हुई आसमान की बिजलियां भय दिखा रही है कि हे मानव जरा संभल कर रहना क्योंकि हम कही पर भी बरस सकतीं हैं। हमे ना तो किसी से प्रेम है और ना ही बैर।

भंवरलाल
ज्योतिषाचार्य एवं संस्थापक,
जोगणिया धाम पुष्कर

कौन अपना कौन पराया इन सब परिभाषाओ से हम दूर है। मेरा परमात्मा केवल प्रकृति है और मै उसी की भक्ति में लीन रह कर अमृत रूपी जल को बिखेरती हूं। मेरा आधा या एक दो सदगुण है जो अहंकार नहीं बढाता वरन उस अहंकार रूपी गर्मी को खत्म कर देता है जो इस जगत को जला रही है।

       हमारा गुरु जगत का मात्र एक पुरुष है जिससे प्रकृति प्रेम करती हैं और हम सब को ओर इस जगत को जिंदा रहने की शक्ति प्रदान करती हैं। डर मत मानव अब बेकाबू गर्मी से छुटकारा मिल गया है जो तुझे दिन रात डरा रही थी और तेरी जान तक लेने पर उतारू थी। प्रकृति और पुरुष का यह मिलन सभी को सुखी और समृद्ध बनाये रखेगा। आज की यह हरियाली कल की खुशहाली बन जायेंगी। आतंक बढ़ाती महंगाई व आर्थिक स्थिति भी सुधर जाएगी।

 मैं केवल सावन मास की बदलिया हीं नही हूं वरन् प्रकृति रूपी शक्ति का अनमोल रथा हूं जो इस धरती को स्वर्ग बनाने आयीं हूं, सभी को कुछ ना कुछ देने आई हूँ। मेरे रथ में प्रकृति अपना खजाना ज्ञान कर्म ओर भक्ति के साधकों को बांटने के लिए आई है। जिसकी जैसी चाकरी होगी उसको वैसा ही फल देने आयी है। सहज रूप से इस अमृत को स्वीकार कर तथा इसका मान बढ़ा और भूल जा कि भूतकाल की गर्मी ने तेरा सब कुछ लूट लिया है। नयी जल धारा की नदियाँ बह रही हैं और कह रही हैं मानव अब डर मत अब सावन की बदलिया बरस रही हैं और सब कुछ ठीक हो जायेगा।

                संत जन कहते हैं कि हे मानव सावन मास के काले बादल और कडकती हुई आसमान की बिजलियों से डर मत, इसे भूतकाल की गर्मी की तरह निर्दयी मत मान क्यो कि यह भुत काल के हर रोंग को साफ़ कर देगी और तेरी केसर जैसी काया जो गर्मी से आतंकित थी अब तेरी काया को केसर की सुगंध से भर देगी।

    इसलिए हे मानव हर नयी व्यवस्था अपने गुणों को फैलाने आती है और इसी उद्देश्य के साथ की पुरानी व्यवस्था के अवगुण खत्म हो जायेगे ओर मानव सुखी समृद्ध ओर चैन की नींद सो सकेगा। इसलिए हे मानव तू प्रकृति के इस बदलाव से डर मत और निडरता से अपने कर्म कर। व्यक्ति के सकारात्मक कर्म सदैव उसे विजयी पुरस्कार देते हैं और सर्वत्र उसके नाम के डंके बज जाते हैं।

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