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 मृत आत्मा का तर्पण और वैशाख मास

 

 

  न्यूज नजर : भारतीय संस्कृति आत्मा और पुनर्जन्म के सिद्धांतों को मानती है। जो जीवन शक्ति हमारे शरीर को संचालित करती है उसे ” आत्मा ” कहा जाता है। व्यक्ति के जीवन से पहले और मृत्यु के बाद यह आत्मा किस अवस्था में रहती हैं इसका विषद और गहनतम उल्लेख भारतीय साहित्य में उपलब्ध है। जो व्यक्ति मर चुका है उसके निमित्त तर्पण और श्राद्ध कर्म करने की मान्यताएं इन्ही ग्रंथो में विद्यमान हैं।

   

भंवरलाल
ज्योतिषाचार्य एवं संस्थापक,
जोगणिया धाम पुष्कर

          तर्पण का अर्थ है तृप्त करना। सभ्यता और संस्कृति के विकास के लिए ओर इसे संरक्षित व संवर्धित करने के लिए जिन्होंने अपना जीवन अर्पित किया हो और जो इस दुनिया से मृत्यु को प्राप्त हो गया हो उनकी प्रतिष्ठा में ऐसा व्यवहार बनाये कि वो तृप्त हो। भारतीय संस्कृति में देवो ऋषियों और जन्म देने वालो को तर्पण करना लगभग सभी पुराण मानते हैं। देव तो अदृश्य शक्ति है ।जिन्होंने सभ्यता और संस्कृति के लिए उपकार किये हैं वे ऋषि तुल्य ही माने गये हैं।

इनके सम्मान में तर्पण किया जाना भारतीय संस्कृति की पहचान है अन्यथा आज तक धार्मिक स्थानो पर सरोवरों पर तर्पण और श्राद्ध कर्म नहीं होते और ना ही मृत आत्मा को सम्मान दिया जाता।

               वैशाख मास में सूर्य का उत्तरायन और मेष राशि में भ्रमण अत्यधिक गर्मी को बढा देता है और इसलिए जलदान छतरी दान ओर छाया दान शर्बत दान खडाऊ दान आदि जीवित ओर जरूरत मंद लोगो को दिया जाता है।

यही हमारी संस्कृति है मानव कल्याण की जो मृत आत्मा को तृप्त रखने के लिए जीवित आत्मा को दान पुण्य ओर सहायता का उपदेश देती है और मृतक के नाम का श्राद्ध जीव जन्तु आगन्तुक व विद्वान को खिलाया जाता है। यह भी जमीनी स्तर पर निश्चित है कि मृत आत्मा आ कर इन सब को ग्रहण नही करतीं लेकिन उनके सम्मान में यह व्यवहार मानो ऐसा लगता है कि मृत आत्मा जिन्दी हो गयी हैं।

       संत जन कहते हैं कि हे मानव केवल जीते जी अपने आप को तृप्त रखना एक स्वार्थ जिसे लगभग सभी साधते है लेकिन मृत आत्मा के सम्मान में अन्य जरूरतमंद लोगों को तृप्त करना ही तर्पण है। मृत्यु के बाद यह जीवन नहीं रहता लेकिन भारतीय संस्कृति ओर आध्यात्मिकता मृत आत्मा के मोक्ष की ही दुआ करतीं हैं भले ही कोई तर्पण करे या ना करे।

 

           इसलिए हे मानव इस जगत में झूठे बैर विरोध सब यही धरे रह जाते हैं और मृत आत्मा के शरीर को अंत में भी शेष शांति के लिए छोड़ दिया जाता है। इसलिए हे मानव तू भले ही मृत आत्मा के लिए तर्पण मत कर लेकिन इस तपते हुए सूर्य के बैशाख मास में तेरे शरीर में पैदा हो रही अनावश्यक आग को ठंडा कर अन्यथा शरीर का संतुलन बिगड़ जायेगा और शरीर के अंदर बैठी आत्मा बाहर निकलने के लिए मजबूर हो जाएगी।

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