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समझ ना आये माया तेरी बदले रंग हजार

 

भंवरलाल, ज्योतिषी एवं संस्थापक, जोगणिया धाम पुष्कर

न्यूज नजर : फकीर मस्ती में मस्त हो कर यह गाता जा रहा था कि ऐ दुनिया के रखवाले आखिर तू क्या करना चाहता है। इसकी थाह तो दिखाई नहीं देती लेकिन इतना जरूर समझ में आता है कि तू हर बार रंग बदल बदल कर अपने खेल को अंजाम दे रहा है और अपना वर्चस्व बनाए रख रहा है। हे नाथ सुना यही है तुम्हारे बारे में कि यह है तुम्हारा धंधा पुराना किसी को बनाना या मिटाना। बस इससे ज्यादा कुछ भी समझ में नहीं आता और ना ही हम कुछ समझना चाहते। क्योकि समझ कर हम तेरे भारी मायाजाल में फंस जायेंगे और अपने आप को भी भुला बैठेंगे।

तेरी कारीगरी ने ही देवो को दर दर भटकने को मजबूर बना दिया तो दानव को स्वर्ग के राज सिंहासन पर बैठा दिया। प्रह्लाद को भक्त बना कर हिरण्यकश्यप को मरवा दिया तो राजा बली को जगत का बलवान और दानवीर बना कर उसे भी पाताल पहुंचवा दिया। रावण की नाभि में अमृत भर कर भी उसे श्री राम के हाथों से मरवा दिया। इतना ही नहीं तूने रास रचैया बन रास लीला में सबको बांसुरी की धुन पर मोह लिया और धर्म को बचाने का महाभारत रचा कर महाभारत का युद्ध करवा दिया। कलयुग को तो तूने कहीं का ना रखा और सच की आड़ में झूठ का खेल दिखा दिया।

हे जगत के श्रेष्ठ कारीगर ! तेरी कारीगरी का यह साँचा बहुत निराला है जो समय स्थिति और काल के अनुसार अपना रूप बदलता ही रहता है और वो खिलोने तैयार कर देता है जो हीरों से जडा हुआ दिखाई देता है और अंत में कांच बन कर अपना रंग रूप दुनिया को दिखा देता है और आखिर में टूट जाता है और बिखर कर पाँवो में चुभ कर नासुर बना कर छोड़ जाता है। अजब गजब की कारीगरी है तेरी सांचो के खिलौनों की जो मन मोह जाता है और हाथ लगने पर बिखर जाता तथा अपने अवशेष छोड़ जाता है। उन अवशेषों की स्मृति शेष में जीवन गुजर जाता है।
इतना कहते कहतें फिर फकीर मुस्करा जाता है और यह कहते कहतें आगे बढ जाता है।


समझ ना आये माया तेरी…

संत जन कहते हैं कि हे मानव माया के वशीभूत हो कर जगत के करतार को खुद मायावी बनना पड़ता है क्यो कि उसने ही जगत में माया को उत्पन्न कर सब को मायाजाल में फंसा कर उस माया का वर्चस्व बढ़ाया है और खुद को भी माया के जाल में फंसाया है।

इसलिए हे मानव तू मायाजाल से निकल नहीं सकता क्योकि माया के सांचे में पाप पुण्य का खेल का खेल नहीं होता और ना ही मैं और तू का परिच्छेद होता। बस यह अनुभव का खेल है कि आज तेरे शरीर की सत्ता है और कल नहीं होगी। इसलिए हे मानव तू मोह माया को त्याग नहीं सकता फिर भी इसमे आवश्यकता के ही कसीदे काढ अनावश्यक बेल बूटियाँ इसके चित्र को विचित्र बना देंगी।

 

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