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वर्षा ऋतु की विरासत चातुर्मास, ‘बरस बरस म्हारा इन्द्र राजा’

न्यूज नजर : प्रकृति का ऋतुचक्र, सभी ऋतुओं के गुणों के आधार पर जगत में संतुलन बनाए रख कर जीव और जगत को जीवित रखता है। ऋतु सर्दी की अगर जानलेवा होती है तो गर्मी, उसके प्रभाव को खत्म कर अपनी प्रचंडता दिखाते हुए जब जानलेवा बन जाती है तो वर्षा
भंवरलाल
ज्योतिषाचार्य एवं संस्थापक,
जोगणिया धाम पुष्कर

उसे शांत कर सभी जीव और जगत को छक कर नहलाती हुई शीतला प्रदान करती है और गर्मी के भारी साम्राज्य को खत्म कर देती है। अपने चार मास में जीव व जगत को अपनी विरासत देती हुई जीव व जगत की बुनियादी आवश्यकताओ की पूर्ति कर जाती है। सावन, भादवा ,आसोज व कार्तिक यह चार मास चौमासा या चतुर्थ मास के नाम से जाना जाता है। यह चातुर्मास ही वर्षा ऋतु की विरासत होती है जो वर्ष भर जीव जगत को जीवित रखती है।

     चातुर्मास की विरासत में वर्षा ऋतु बरसात के जल से गर्मी से तपी धरती को स्नान करा उसे ऊपजाऊ बना देती है और हरी सावन की चादर ओढा देती है और फल फूल वनस्पतियो से धरती अपनी गोद भर लेती है। जल स्त्रोत भर कर जीवो की प्यास बुझाते है। वर्षा ऋतु की यही विरासत जीवन की रक्षा करती है और मानव को अपनी रूचि के अनुसार ज्ञान कर्म और भक्ति के अनुसार आगे बढने को प्रेरित करती है।
         आखेट युग से आज तक के इस विज्ञान के युग मे भी वर्षा ऋतु की यह विरासत ना किसी धर्म से ना जाति से ओर ना ही किसी गोत्र से इस मे बदलाव आया। आखेट युग का मानव जब इन धर्म जाति गोत्र की परिभाषाओ को नही जानता तब से आज के युग के मानव मे जो धर्म जाति और गोत्र के मायाजाल मे फसा हुआ है तथा सामाजिक व भोतिक दूरिया बनाए हुए व्यवहार करता है तक भी इस वर्षा ऋतु ने अपनी उत्तम विरासत को नही छोडा और अपना मुकद्दर नही किसी की तकदीर संवारने के लिए भी पीछे नही हटी।
        आषाढ मास की  प्रचंड गर्मी की बढाता हुआ सूर्य जब इस मास मे चन्द्र को पूर्णिमा पर देख लेता है तो यह आषाढी पूर्णिमा गुरू बन कर मानो सूर्य को संदेश दे रही है हे गर्मी के बादशाह अब जगत के कल्याण मार्ग की ओर बढ तथा दिल मे किसी भी भेद को मत रख तथा धरती व बरसात का मिलन होने जा रहा है जहा हर मर्यादा टूट जायेगी और बरसात के बहाने धरती को परमेश्वर रूपी प्रियतम मिल जायेगा। अदृश्य शक्ति के अदृश्य देव जिनका आधार श्रद्धा और विश्वास है जिनको साकार या निराकार रूप में माना जाता है और धार्मिक मान्यताएं उसी को इस जगत की सत्ता मानतीं है। जो सर्व शक्ति मान है और कुछ भी करना उसके लिए संभव होता है। उनके शयन की ओर जाने का समय आ गया है।आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी से कार्तिक मास की शुक्ल एकादशी तक यह देव शयन काल माना जाता है और हिन्दु धर्म में सभी मांगलिक कार्यों पर प्रतिबंध लग जाता है।
 चार मास तक देवों के शयन काल में जगत की व्यवस्था कैसे चलती है इस विषय की ओर हम देखते हैं तो हम पाते हैं कि ज्ञान योग कर्म योग ओर भक्ति योग में रम रहे सभी लोग अपनी भूमिका का निर्वाह कर देवों की शक्ति को जागृत किये हुए रहते हैं और सारी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के प्रयास करते हैं। इन चारो मास में सर्वप्रथम जगत की विनाशकारी शक्ति को नियंत्रित करने के लिए सावन मास में शिव की पूजा उपासना पूरे मास तक की जाती हैं तो भाद्रपद मास में जगत के पालन करने वाली शक्ति के अवतार के रूप में आराधना और उत्सव मनाये जाते हैं। आसोज मास में कृष्ण पक्ष जो शनैः शनैः खो कर पूर्ण अंधेरों में चले जाते हैं उनकी याद में हम मृत शक्ति की यादो के दान पुण्य कर उन की यादो को जिंदा रखते हुए दान पुण्य तर्पण और श्राद्ध करते हैं। उस विनाशकारी शक्ति पालन हारी शक्ति ओर आत्मा रूपी मानव शरीर जो मृत हो चुकी है उनकी शक्ति को पूज कर मानव अपने आप को सुरक्षित महसूस करता है। सामूहिकता की शक्ति में प्रवेश करता हुआ नवरात्रा मनाता है और प्रकट रूप से शक्ति को संचित करता है।
          कार्तिक मास में सामूहिकता की सहयोग लक्ष्मी सर्वत्र खुशियाँ मनाते हुए सबको आनंदित कर देती है। इसी के साथ देव पुनः जाग जाते हैं और सूर्य का उतरायन भी हो जाता है तथा देव अपनी व्यवस्था को पुनः संभाल लेते हैं।
          ज्ञानी जन ध्यान ज्ञान और उपदेश द्वारा कर्मवीर अपने कर्म के सहयोग द्वारा तथा भक्त जन अपनी भक्ति के माध्यम से तथा इन सब से अलग हटकर आध्यात्मिक जन जो आत्मा ओर अदृश्य शक्ति की भक्ति में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं वो शक्तियो को साक्षत जमीन पर लाने में लगे रहते हैं।सभी के अलग अलग प्रयास कर देव शयन काल में देवों की शक्तियों को जागृत किये हुए रहते हैं।
                      संतजन कहते हैं कि हे मानव यह प्रकृति आध्यात्म से लबालब है हर जीव व जगत इस आध्यात्म से भरपूर है। आध्यातम को सीमा में नहीं बांधा जा सकता है और ना ही यह जंगल गुफाओं और किसी सीमा विशेष या व्यक्ति विशेष में पाया जाता है वरन यह प्रकृति की वह जागीर है जो सर्वत्र हर जीव व जगत में विद्यमान हैं। ज्ञानी का ज्ञान कर्म वीर का कर्म और भक्त की भक्ति यही उसकी आध्यात्मिक शक्ति होती है और वही उसका भगवान होता है। इससे हट कर केवल करिश्माई मार्ग होते हैं और उसका एकाधिकार केवल अदृश्य शक्ति के अदृश्य के पास ही होता है किसी भी मानव के पास नहीं। अगर ऐसा ना होता तो मानव सभ्यता ओर संस्कृति को हर बार विपत्ति का सामना ना करना पड़ता।
             इसलिए हे मानव, सूर्य का दक्षिणायन की ओर गति करना ही धार्मिक मान्यताओं में देव शयन काल है। यह चार मास वर्षा ऋतु है जो धरती को हरा भरा कर सर्वत्र जल स्त्रोत भर देती हैं, अपनी विनाशकारी लीला से जन धन की क्षति भी कर देती हैं और कई मौसमी बीमारियों को पैदा कर देती हैं । यातायात बाधित होता है तथा हर व्यवस्था लडखडा जाती है। अत व्यवहारिक रूप से भी मांगलिक कार्य हो या कोई भी कार्य हो सभी बरसात की ऋतु से प्रभावित हो जाते हैं। इन सब से जूझंता कर्म वीर सहायता कर अपने कर्म के भगवान को सबके सामने पर प्रकट कर देता है। इस लिए हे मानव ऋतुओ का ज्ञान समझ कर कर्म कर तथा भक्त बन कर इस ऋतु से पीड़ित लोगों की रक्षा भक्ति से कर निश्चित रूप से तेरी शोहरत व्यावहारिक आध्यात्मिक व्यक्तियों की तरह देखी जायेगी।