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सांप दूध नहीं पीते, बीन पर नाचते भी नहीं

सांप हमारी सभ्यता और धर्म से जुड़ा रोचक जीव है। भगवान शिव का जिक्र हो या तेजाजी का, सर्प देवता को नमन करना हम नहीं भूलते हैं। नाग योनी से लेकर नाग लोक तक कई किस्से हमारी सभ्यता संस्कृति का अंग हैं। इसी का फायदा उठाते हुए कुछ लोग हमारे भावनाओं से खिलवाड़ करने से भी नहीं चूकते हैं। अजब गजब की इस कड़ी में हम इस बार जानेंगे सांपों से जुड़े कई मिथक और उनका वैज्ञानिक जवाब-


सांपों से जुड़ी हुई हमारी प्रथम मान्यता यह है कि सांप दूध पीते है। यहाँ तक की हम  नाग पंचमी और अनेक अवसरों पर उन्हें दूध पिलाते भी हैं।

जबकि जीव विज्ञान के अनुसार सांप पूरी तरह से मांसाहारी जीव हैं। ये मेढ़क, चूहा, पक्षियों के अंडे व अन्य छोटे-छोटे जीवों को खाकर अपना पेट भरते हैं। दूध इनका प्राकृतिक आहार नहीं है।

सपेरों को जब भी सांप को दूध पिलाना होता है तो वो उन्हें भूखा प्यासा रखते हैं।  भूखे प्यासे सांप के सामने जब दूध लाया जाता है तो वह इसे पी लेता है लेकिन यह कभी कभी सांप कि मौत का कारण भी बन जाता है क्योकि कई बार दूध सांप के फेफड़ों में घुस जाता है जिससे उसे निमोनिया हो जाता है।

सांप अपने साथी की मौत का बदला लेते है !
हमारे समाज में ऐसी मान्यता है कि यदि कोई मनुष्य किसी सांप को मार दे तो मरे हुए सांप की आंखों में मारने वाली की तस्वीर उतर आती है, जिसे पहचान कर सांप का साथी उसका पीछा करता है और उसको काटकर वह अपने साथी की हत्या का बदला लेता है। यह सांपों से जुड़ा एक ऐसा अंधविश्वास है जिसका हमारे यहाँ कहानियों और फिल्मों में जमकर इस्तेमाल हुआ है। लेकिन यदि हम बात वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से करे तो इसमें तनिक मात्र भी सच्चाई नहीं है।

सांप अल्पबुद्धि वाले जीव होते हैं। इनका मस्तिष्क इतना विकसित नहीं होता कि ये किसी घटनाक्रम को याद रख सकें और बदला लें। जीव विज्ञान के अनुसार जब कोई सांप मरता है तो वह अपने गुदा द्वार से एक खास तरह की गंध छोड़ता है जो उस प्रजाति के अन्य सांपों को आकर्षित करती है। इस गंध को सूंघकर अन्य सांप मरे हुए सांप के पास आते हैं, जिन्हें देखकर ये समझ लिया जाता है कि अन्य सांप अपने मरे हुए सांप की हत्या का बदला लेने आए हैं।

सांप बीन की धुन सुनकर नाचते हैं!
खेल-तमाशा दिखाने वाले कुछ लोग सांप को अपनी बीन की धुन पर नचाने का दावा करते हैं जबकि ये पूरी तरह से अंधविश्वास है क्योंकि सांप के तो कान ही नहीं होते। दरअसल ये मामला सांपों की देखने और सुनने की शक्तियों और क्षमताओं से जुड़ा है। सांप हवा में मौजूद ध्वनि तरंगों पर प्रतिक्रिया नहीं दर्शाते पर धरती की सतह से निकले कंपनों को वे अपने निचले जबड़े में मौजूद एक खास हड्डी के जरिए ग्रहण कर लेते हैं।

सांपों की नजर ऐसी है कि वह केवल हिलती-डुलती वस्तुओं को देखने में अधिक सक्षम हैं बजाए स्थिर वस्तुओं के। सपेरे की बीन को इधर-उधर लहराता देखकर नाग उस पर नजर रखता है और उसके अनुसार ही अपने शरीर को लहराता है और लोग समझते हैं कि सांप बीन की धुन पर नाच रहा है।

सांप मणिधारी होते है !
सांपों से जुडी एक अन्य मान्यता यह है कि कई सांप मणिधारी होते हैं यानी इनके सिर के ऊपर एक चमकदार, मूल्यवान और चमत्कारी मणि होती है। यह मणि यदि किसी इंसान को मिल जाए तो उसकी किस्मत चमक जाती है।

जीव विज्ञान के अनुसार यह मान्यता भी पूरी तरह से अंधविश्वास है क्योंकि दुनिया में अभी तक 3000 से भी ज्यादा प्रजातियों के करोड़ों सांप पकडे जा चुके हैं लेकिन किसी के पास भी इस प्रकार कि कोई मणि नहीं मिली है। तमिलनाडु के इरुला जनजाति के लोग जो सांप को पकडऩे में माहिर होते हैं वे भी मणिधारी सांप के होने से इंकार करते हैं।

कुछ सांपों के दोनों सिरो पर मुंह होते हैं!
कभी कभी जेनेटिक चेंज कि वजह से ऐसे सांप तो पैदा हो जाते हैं जिनके एक सिर की जगह दो सिर होते हैं ऐसा इन्सान सहित इस धरती के किसी भी प्राणी के साथ हो सकता है। लेकिन ऐसा कोई भी सांप नहीं होता है जिसके दोनों सिरो पर मुंह होते हैं।

होता यह है कि कुछ सांपों की पूंछ नुकीली न होकर मोटी और ठूंठ जैसी दिखाई देती है। चालाक सपेरे ऐसे सांपों की पूंछ पर चमकीले पत्थर लगा देते हैं जो आंखों की तरह दिखाई देते हैं और देखने वाले को यह लगता है कि इस सांप को दोनों सिरों पर दो मुंह हैं।

कुछ सांपों की मुंछे होती हैं !
सांपों कि एक प्रजाति “हॉर्नड वाईपर” के सींग तो होते हैं पर सांप कि किसी भी प्रजाति के मुंछे नहीं होती है क्योंकि सांप सरीसृप (रेप्टाइल) वर्ग के जीव हैं, इनके शरीर पर अपने जीवन की किसी भी अवस्था में बाल नहीं उगते।

होता यह है कि सांप को कोई खास स्वरूप देने पर अच्छी कमाई हो सकती है इसी लालच में सपेरे घोड़े की पूंछ के बाल को बड़ी ही सफाई से सांप के ऊपरी जबड़े में पिरोकर सिल देता है। इसके अलावा जब कोई सांप अपनी केंचुली उतारता है तो कभी-कभी केंचुली का कुछ हिस्सा उसके मुंह के आस-पास चिपका रह जाता है। ऐसे में उस सांप को देखकर मुंछों का भ्रम हो सकता है।

उड़ने वाले सांप होते हैं!
वैसे तो सांपों की किसी भी प्रजाति में उड़ने का गुण नहीं होता है। लेकिन भारत और दक्षिण पूर्वी एशिया के वर्षा वनो (रेन फारेस्ट) में एक सांप पाया जाता है जिसका नाम ही फ्लाइंग स्नेक है। हालांकि इनमें भी इनके नाम के अनुरुप उड़ने का गुण नहीं होता है। लेकिन इनमें अन्य सांपों से अलग एक विशेष क्वालिटी पाई जाती है।

ये फ्लाइंग स्नेक अपना अधिकांश समय वर्षा वनों के ऊंचे ऊंचे पेड़ों पर बिताते हैं। इन सांपों को जब एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर जाना होता है तो यह अपने शरीर को सिकोड़कर छलांग लगा देते हैं। जब ये सांप उछलकर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर जाते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे ये उड़ रहे हों। हालांकि इस तरह से यह 100 मीटर तक की दूरी तय कर लेते हैं।

कुछ सांप इच्छाधारी होते हैं !
एक और बहुप्रचलित मान्यता जिसका कि हमारे साहित्य और फिल्मों में जमकर प्रयोग हुआ है वह यह है कि कुछ सांप इच्छाधारी होते हैं यानी वे अपनी इच्छा के अनुसार अपना रूप बदल लेते हैं और कभी-कभी ये मनुष्यों का रूप भी धारण कर लेते हैं। ये भी एक मान्यता है जो कि पूरी तरह से गलत है। जीव विज्ञान के अनुसार इच्छाधारी सांप सिर्फ मनुष्यों का अंधविश्वास और कोरी कल्पना है, इससे ज्यादा और कुछ नहीं।

सांपों की आंखो मे सम्मोहन शक्ति होती है!
कुछ लोग मानते हैं कि सांप की आंखों में किसी को भी सम्मोहित करने की शक्ति होती है यानी सांप जिसकी भी आंखों में देख लेता है वह मनुष्य या अन्य कोई प्राणी उस सांप के आदेश का पालन करता है। यह भी अंधविश्वास और कोरी कल्पना के अलावा कुछ नहीं है।

सभी सांप अंडे देते है !
ऐसा नहीं है। धरती पर पाए जाने वाले सांपों मे से 70 फीसदी सांप अंडे देते हैं पर बाकी 30 प्रतिशत प्रजातियाँ, इंसानों कि तरह बच्चे पैदा करती हैं।                                                                                            -नामदेव न्यूज